Thursday, July 17, 2014

कहां है गणतंत्र ?

हम 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस कैसे मना सकते हैंजब महिलाएं असुरक्षित हैं. हमारे लिए आज गणतंत्र दिवस है जब हम यहां इंसाफ के लिए जमा हुए हैं.  यह कथन दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का है. अरविंद का यह कथन कहीं ना कहीं उस व्यवस्था के खिलाफ था जो आजादी के बाद से ही हाशिए पर चला गया था.

26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ, जिसके बाद भारत सरकार के संसदीय रूप के साथ एक संप्रभुताशाली समाजवादी लोक‍तांत्रिक गणतंत्र के रूप में सामने आया. चाहे वैधानिक स्वतंत्रता हो या फिर वैचारिक स्वतंत्रता, या फिर हो सामाजिक और धार्मिक स्वतंत्रता, आज हम हर तरह से स्वतंत्र हैं. लेकिन कहीं ना कहीं मन में हमेशा एक सवाल रहता है कि क्या सचमुच हम स्वतंत्र हैं?


देश तभी जाकर पूर्ण आजाद माना जाता है जब वह गणतांत्रिक होता है, लेकिन भारत में आज जो हो रहा है उसे देखते हुए हमें भारत के गणतंत्र कहे जाने पर बेहद निराशा होती है. घोटालों, वंशवाद और भ्रष्टाचार ने भारत जैसे गणतंत्र की नींव हिला दी है. कभी-कभी लगता है कि हम आज भी गुलाम हैं. बस पराधीनता का स्वरूप बदल गया है.

गणतंत्र होने का मूल अर्थ है कि अब देश का शासक अनुवांशिक राजा नहीं बल्कि जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि होगा. उपरोक्त कथन के अनुसार साफ है कि गणतंत्र में देश का शासक अनुवांशिक राजा नहीं होगा लेकिन आज अगर हम देश की सबसे ताकतवर पार्टी यानि कांग्रेस पार्टी की तरफ देखते हैं (जिस पार्टी के कई नेताओं ने प्रधानमंत्री बन देश का प्रतिनिधित्व किया है) तो पाएंगे कि इस पार्टी में ही सबसे बड़ा वंशवाद फल-फूल रहा है. जवाहर लाल नेहरू जी की राजनीति की गद्दी को अगर उनकी सुपुत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने सहारा दिया तो वहीं राजीव गांधी ने भी मां की असमय मृत्यु के बाद उनके शासन को संभाला और अब इसी परंपरा का वहन राहुल गांधी करने को तैयार हैं.

अनुवांशिक राजाओं या शासकों की एक बड़ी जमात हमें राज्य स्तर की राजनीति में भी नजर आती है. मुलायम सिंह यादव – अखिलेश यादव, ओम प्रकाश चौटाला -अजय चौटाला, करुणानीधि – स्टालिन, शिबू सोरेन- हेमंत सोरेन आदि ऐसे कई नाम हैं जो गणतंत्र की मूल व्याख्या के विपरीत नजर आते हैं.

पिछले लंबे समय से देश के सामने कई बड़े घोटाले उजागर हुए हैं जिन्होंने देश को आर्थिक स्तर पर करारा झटका पहुंचाया है. नीतिगत फैसले और व्यक्तिगत लाभ के लिए सरकारी पदों के दुरुपयोग का घुन राष्ट्र की शक्ति को खोखला कर रहा है. इससे विश्व में भारत की छवि भी खराब हुई, जहां भारत को एक शिथिल राष्ट्र के तौर पर देखा जा रहा है.

ऊंचे पदों पर बैठे कई लोग अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल करते हुए महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं. राह चलती महिलाओं पर तेजाब फेंकने की घटनाएं, सरेराह लूटपाट करते लुटेरे और आए दिन होने वाली हत्याएं यह गवाही देती हैं कि देश में लोकतंत्र अब गुण्डातंत्र में तब्दील हो रहा है. गणतंत्र राष्ट्र बनने के बाद से ही भारत भले ही धीमी गति से लेकिन बहुत कुछ प्राप्त किया. कई क्षेत्रों में विकास भी हासिल हुआ लेकिन रोजगार के अवसर की स्थिति जस की तस बनी है.

हजारों साल पुरानी हमारी इस सभ्यता को कई बार गुलाम की बेड़ियों से बांधा गया. कई वंशों और सभ्यताओं ने हम पर शासन किया, लेकिन आजादी के छह दशक बाद भी कभी-कभी ऐसा लगता है कि आज भी कोई हम पर शासन कर रहा है.शायद हमारी अपनी ही बनाई व्यवस्था के अधीन हम अपने आप को जकड़ा हुआ महसूस करते हैं. शायद उपरोक्त कथन में अरविंद केजरीवाल भी यही कहना चाहते थे.

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